Sunday, 2 March, 2008

बी.एच.यू. के छात्रावासों

कल http://tippanikar.blogspot.com/2008/03/blog-post. पर एक पोस्ट थी जिसपर किसी के एक बहुत ही अच्छे मेल को चढाया गया था. जिसके नीचे मैंने कुछ प्रार्थना की थी, लेकिन २४ घंटे से ज्यादे बीत गए है मेरी प्रार्थना पर कोई ध्यान नही दिया गया. मेरी प्रार्थना इन पंक्तियों के चलते थी जरा पढे-
भड़ास नाम के ब्लॉग ने जब ये फ़रमाया कि बी.एच.यू. के छात्रावासों (जिसके फ़्य़ूडल महौल में क्या नाम है ये यशवन्त पढ़ा-बढ़ा है शायद) में या कहीं भी गालियाँ/भड़ास लोगों के संवाद को डेमोक्रेटाइज़ करता है तो उससे पूछा जाना चहिये था कि उस डिमोक्रेसी में या बनारस के मशहूर मस्तराम छाप कवि-सम्मेलन में कितनी औरतें शिरकत करती हैं और किन-किन जातियों/कौमों को ये गालियाँ मीठी/कड़वी लगती हैं. बजाय इसके आप सबने भडास को सेलेब्रेट ही किया. और जब अपने सिर लगी तब बिफर रहे हैं.
भाई आपको जो कहना था यशवंत, कुलवंत या किसी और के बारे मे कहिये, आप एक विश्वविद्यालय का नाम काहे बरबाद करते है , एक शहर का नाम काहे बरबाद करते है. क्या आप बता सकते है इस का क्या मतलब है बी.एच.यू. के छात्रावासों (जिसके फ़्य़ूडल महौल में... आप सिद्ध क्या करना चाहते है क्या आपको पता है बी.एच.यू. के छात्रावासों मे कितने छात्र रहते है. और वो सारे अगर ऐसे ही कुंठित या बीमार मानसिकता के हो जाए तो आप के देश का क्या हाल होगा. जरा सोचिये.
मैं यहाँ पर NACC (if you know, what NACC is?) के वेबसाइट पर उपलब्ध कुछ जानकारी देता ह जो की २००६ के लिए अद्यतन थी.
There is a total strength of 15290 students in various programmes,..........The university has 43 boys and 17 girls hostels with an acomodation capacity of 7003 boys and 2125 girls respectively.
यह नम्बर आपको इसलिए बताया गया है की आप ही सोच लीजिये अगर ये विद्यार्थी आपके द्वारा वर्णित माहौल मे रहते तो वो निश्चित रूप से कुंठित होते, और अगर विश्विद्यालय के ९२ साल के इतिहाष के ४६ साल से भी आप इस संख्या का गुणा कर दे तो आप के देश मे इस तरह के कुंठित लोगो की संख्या लाखो मे होती जो की पढे लिखे होते, उचे पोस्ट पर विराजमान होते और घटिया तरह की शब्दावली उसे कर रहे होते, और शायद आप को नही पता हो तो यह भी बता दे की तब आप के देश की हर IIT, और आधे विश्विद्यालय के प्रोफेसर इस कुंठित मानशिकता को प्रोमोट कर रहे होते, और धीरे धीरे यह समस्या कई पीढियों से होते हुए विकराल रूप धर लेती, और मुझे पता है की आप भारत मे चाहे जहा से पढे होते आप भी उसी तरह से होते. आप अपने आस पास के छोटी सी दुनिया से बाहर आइये और बी.एच.यू. के प्राचीन छात्रों से मिलिए (कुछ आपके आस पास मे होंगे ही ) और बताइए की उसमे से कितने आपको कुंठित मिले. मैं एक दम से दावा तो नही करता लेकिन जितनो से मिलेंगे अधिकतर का मानशिक स्तर कम से कम आप से तो ऊचा होगा ही. तो बेहतर होगा की हर जगह कुछ स्पेशल शब्द लिख कर के आपने आप को प्रगतिशील मत बनाइये, आप अगर प्रगतिशील है तो प्रगतिकिजिये दूसरे संस्थानों पर कीचड़ मत उछालिये.

मैं बी.एच.यू. का पुराना छात्र होने के नाते हर उस बात की भर्त्सना करता हू जो की विश्विद्यालय की ग़लत छवि पेश करता है, अगर विश्विद्यालय के कुछ छात्र गाली देते हुए मिले तो हो सकता है की ये समस्या उनके अपने परिवेश की देन हो. बेहतर होगा की आइन्दा से आप अगर कोई भी चीज़ ब्लॉग जगत मे लिखे तो थोड़ा अपने power of Analysis का प्रयोग करे.
रही बात ..................उस डिमोक्रेसी में या बनारस के मशहूर मस्तराम छाप कवि-सम्मेलन में कितनी औरतें शिरकत करती हैं.... तो श्रीमान जी शायद आपको पता नही है की अब बनारस मे वो विशेष कवि सम्मेलन नही होता है (कितना बुरा हुआ, अगर होता रहता तो शायद....जाते मुँह छुपा के सुन ही आते और फ़िर बाहर निकल कर प्रगतिशील तो हो जाते ). रही बात कौन लोग वहा जाते थे तो वही लोग जाते थे जो भंग के नशे मे हो या कुंठित हो, और हां बनारस मे और जो प्रोग्राम्स होते है उनके बारे मे कभी आप प्रशंषा भी करिये, अगर आप को पता हो ?. आइये अप्रिल महीने मे संकट मोचन संगीत समारोह का आनंद लीजिये (कम से कम ५ दिन फ्री मे) रबड़ी खाइए,मल्लाहों और सामान्य लोगो से गप ढीलिये हो सकता है आप भी शंकराचार्य हो जाए, रामनगर जा के लस्सी पीजिए, नवम्बर मे जाइए गंगा महोत्सव का आनंद लीजिये, ध्रुपद महोत्सव सुनिए, या घर मे CD लगाके रविशंकर को सुनिए, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को सुनिए, राजन सजन मिश्रा को सुनिए, गिरिजदेवी को सुनिए, या फ़िर पुराने कसेट से सिध्हेस्वारी देवी को सुनिए, अच्छा संगीत आपको स्वस्थ कर देगा, फ़िर प्रगतिशील बनने के लिए बहुत समय है, और अगर इसके बाद भी बनारस या बी एच यू को फ्युदल कहने का मन करे तो कहियेगा, फ़िर सब लोग थोड़े ही सुधर सकते है हम मान लेंगे की कुछ लोग है जो लाइलाज है.

5 comments:

अनूप शुक्ल said...

अरे प्रवीन जी, आप काहे जी हलकान किये हो। ऊ न हटायेंगे अपनी पोस्ट से सनसनाती टिप्प्णी। उनका कामै यही है। विवादास्पद बातें सबको दिखाते रहना। मर्द टिप्पणीकार हैं न! मर्द को दर्द नहीं होता न!
हम भी बी.एच.यू से पढ़ें हैं। धनराजजिरि और राजपूताना हास्टल में रहे दो साल।

Praveen said...

सर हमको पता है की आप MLNIT (नया नाम शायद यही है) और BHU मे पढे है, मैंने आपके पुरानी पोस्ट साइकिल यात्रा वाली पे पढ़ा था ये. और हम हलकान नही हो रहे है, बस थोड़ा सा लिख दिए. आख़िर कुछ तो बताना चाहिए ना की विश्वविद्यालय है कोई नेता थोड़े ही सब कोई उपदेश देके चल देगा.

Praveen said...

और हां यह वादा जरुर करते है की दुबारा इस विषय पर नही लिखेंगे, चाहे कुछ भी हो जाए जो कहना था एक पोस्ट मे लिख दिए.

हर्षवर्धन said...

प्रवीणजी
मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़ा हूं। लेकिन, बीएचय़ू के बहुत से मित्र हैं। और, मुझे ये बात एकदम समझ में नहीं आती कि किसी एक व्यक्ति की करनी से पूरे विश्वविद्यालय को कैसे जोड़ा जा सकता है। वैसे आपने एक ही पोस्ट में अच्छा जवाब दिया है। और, तो विश्वविद्यालय है, हर तरह के लोग किसी भी जगह होते हैं।

काकेश said...

कुछ लोग सिर्फ सनसनी से ही जीते हैं जी. बी एच यू के कई मित्र हैं मेरे. आप परेशान ना हों लिखते रहें.